बैकुंठ शुक्ल

बैकुंठ शुक्ल (15 मई 1907 – 14 मई 1934) एक भारतीय राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी थे। वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के संस्थापकों में से एक, योगेंद्र शुक्ला के भतीजे थे । उन्हें फणींद्र नाथ घोष की हत्या के लिए फांसी दी गई थी, जो सरकारी सरकारी गवाह बन गए थे, जिसके कारण भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी ।

1931 में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षडयंत्र कांड में फांसी की सजा के एलान से पूरे भारत में गुस्से की लहर फ़ैल गयी. फणीन्द्र नाथ घोष, जो खुद रेवोल्यूशनरी पार्टी का सदस्य था, अंग्रेजी हुकूमत के दबाव और लालच में आकर वादामाफ़ गवाह बन गया और उसकी गवाही पर तीनों वीर क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी.

इसी घोष को विश्वासघात की सजा देने का बीड़ा बैकुंठ शुक्ल ने उठाया और 9 नवंबर 1932 को घोष को मारकर इसे पूरा किया. उन्होंने उस फणीन्द्र नाथ घोष को दिनदहाड़े बेतिया के मीना बाजार में कुल्हाड़ी से काट डाला जिसकी गवाही के आधार पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटका दिया गया था. इसी घोष की हत्या के आरोप में उन्हें अंग्रेज सरकार की तरफ से फांसी की सजा मिली.

14 मई 1934 को गया केंद्रीय जेल में 28 वर्ष की उम्र में हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल कर वे बैकुंठ शुक्ल से अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल बन कर इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमरत्व को पा गए. गौरतलब है कि वे महान क्रांतिकारी और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापकों में से एक योगेंद्र शुक्ल के भतीजे भी थे.

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